छत्तीसगढ़ होमगार्ड : स्टाफ 62 और जवानों को 60 वर्ष में कर रहा रिटायर

छत्तीसगढ़ होमगार्ड विभाग में कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) की उम्र को लेकर एक बड़ा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। राज्य सरकार के स्पष्ट नियमों के बावजूद विभाग के भीतर ही कर्मचारियों और जवानों के बीच भेदभाव नजर आ रहा है।
रायपुर (CGVARTA)। छत्तीसगढ़ होमगार्ड विभाग में कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) की उम्र को लेकर एक बड़ा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। राज्य सरकार के स्पष्ट नियमों के बावजूद विभाग के भीतर ही कर्मचारियों और जवानों के बीच भेदभाव नजर आ रहा है।
विभाग में कार्यरत ऑफिस स्टाफ (मंत्रालयीन/कार्यालयीन कर्मचारियों) को 62 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त किया जा रहा है, जबकि मैदानी जवानों और अन्य मैदानी अमले को 60 वर्ष की उम्र पूरी होते ही रिटायर किया जा रहा है।
क्या है नियम और विवाद की वजह?
राज्य सरकार के वित्त निर्देश 54/2013 में स्पष्ट उल्लेख है कि कर्मचारियों की रिटायरमेंट आयु 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष कर की जाए। सरकार का यह फैसला सभी विभागों के लिए समान रूप से लागू किया गया था, लेकिन छत्तीसगढ़ होम गार्ड ने इस व्यवस्था को अपने जवानों के लिए लागू नहीं किया। जबकि छत्तीसगढ़ सरकार के नियमों के अनुसार, राज्य के सामान्य शासकीय सेवकों की ही तरह पुलिस विभाग के सिपाहियों और अन्य कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति की आयु सीमा 62 वर्ष का लाभ दिया जा रहा है।
जवानों में भारी नाराजगी
पीड़ित जवानों का कहना है कि जब पूरा विभाग एक ही शासन के अधीन कार्य करता है, तो सेवानिवृत्ति के नियमों में यह अंतर पूरी तरह से अनुचित और दोहरे मापदंड को दर्शाता है।
सवाल और मांग
जवानों का कहना है कि जल्द ही इसका लाभ सभी जवानों को भी समान रूप से मिले। जवानों ने शासन और विभाग के उच्च अधिकारियों से इस नीतिगत विषमता को दूर कर सभी के लिए 62 वर्ष की आयु सीमा लागू करने की मांग की है।
कानूनी लड़ाई की तैयारी
2013 के बाद से ही लगातार जवान अपनी मांग विभाग के उच्चाधिकारियों और सरकार से कर रहे हैं, पिछले 13 वर्ष में भी इस सामान्य सी समस्या का समाधान नहीं मिलने से नाराज और कम उम्र में ही सेवानिवृत्त हो चुके कर्मचारी अब न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं।
सरकार के हस्तक्षेप की जरूरत
हमारा मानना है कि यदि इस तरह की विसंगति किसी विभाग में नजर आ रही है और विसंगति का समाधान नहीं हो रहा है तो राज्य सरकार के गृह मंत्रालय अथवा मुख्यमंत्री को मामले को संज्ञान में लेकर उचित निर्देश दिए जाने चाहिए, इससे सरकार की छवि प्रदेश की जनता के बीच और भी ज्यादा निखरेगी।
अदालती कार्रवाई से बचने का रास्ता
यदि सरकार समय रहते हस्तक्षेप कर इस नीतिगत विसंगति को दूर कर देती है, तो जवानों को बेवजह कोर्ट-कचहरी के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे और शासन का समय व संसाधन भी बचेगा।
समानता का अधिकार
एक ही विभाग में काम करने वाले कर्मचारियों के बीच इस तरह का भेदभाव प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
डीजीपी की दोहरी जिम्मेदारी से जगी न्याय की उम्मीद
गौरतलब है कि राज्य के पुलिस महानिदेशक अरूण देव गौतम ही होम गार्ड विभाग के महानिदेशक का प्रभार भी संभालते हैं। ऐसे में प्रताड़ित और प्रभावित कर्मचारियों को उनसे विशेष अपेक्षाएं हैं। कर्मचारियों का मानना है कि पुलिस विभाग और होम गार्ड दोनों के सर्वोच्च प्रमुख एक ही अधिकारी होने के नाते वे इस प्रशासनिक विसंगति और जवानों की व्यथा को भली-भांति समझते हैं। कर्मचारियों ने उम्मीद जताई है कि डीजी महोदय स्वयं इस संवेदनशील मामले में संज्ञान लेंगे और विभाग में चल रहे इस दोहरे रवैये को समाप्त कर जल्द से जल्द राहत प्रदान करेंगे।

Niraj Tiwari
Independent journalist with 5 years of hands-on experience covering ground reports, interviews, and investigative stories. Committed to truthful reporting and ethical journalism.
