20 साल बाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: रिश्वत मामले में तहसील कर्मचारी को मिली राहत, जानिए पूरा मामला

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बिल्हा तहसील कार्यालय के तत्कालीन रीडर बाबूराम पटेल को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लगे सभी आरोपों से बरी कर दिया है। यह मामला करीब 20 साल पुराना था। अदालत ने कहा कि अभियोजन यह साबित करने में असफल रहा कि आरोपी ने रिश्वत मांगी या स्वीकार की थी।
मामला वर्ष 2002 का है, जब शिकायतकर्ता मथुरा प्रसाद यादव ने आरोप लगाया था कि बाबूराम पटेल ने उसके पिता की जमीन का खाता अलग करने के नाम पर ₹5000 की रिश्वत मांगी थी, जो बाद में ₹2000 तय हुई। इसके बाद लोकायुक्त पुलिस ने ट्रैप की कार्रवाई की और ₹1500 रुपये बरामद किए जाने का दावा किया।
वर्ष 2004 में विशेष न्यायाधीश ने पटेल को दोषी मानते हुए एक-एक साल की सजा सुनाई थी। लेकिन हाईकोर्ट में अपील के बाद अब यह फैसला पलट गया।
अधिवक्ता विवेक शर्मा ने अदालत में तर्क दिया कि शिकायत द्वेषवश की गई थी, क्योंकि शिकायतकर्ता की पत्नी पूर्व सरपंच थीं और उनके खिलाफ जांच में बाबूराम पटेल ने भाग लिया था।
हाईकोर्ट ने पाया कि केवल नोटों की बरामदगी से रिश्वत साबित नहीं होती, जब तक मांग और स्वीकारोक्ति के पुख्ता सबूत न हों। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता ने खुद माना कि उसे स्पष्ट नहीं था कि 1500 रुपये रिश्वत थे या पट्टा शुल्क।
साक्ष्यों में विरोधाभास और रिकॉर्डेड बातचीत में अस्पष्ट आवाज के आधार पर कोर्ट ने कहा कि “अभियोजन का मामला टिकाऊ नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट के बी. जयाराज बनाम स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश (2014) और सौंदर्या राजन बनाम स्टेट (2023) के हवाले से कोर्ट ने कहा कि, जब आरोप संदेह से परे साबित न हों तो आरोपी को लाभ दिया जाना चाहिए।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने विशेष न्यायाधीश का निर्णय रद्द करते हुए बाबूराम पटेल को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

Niraj Tiwari
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