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        रायपुर आरटीओ में फैला 'नेटवर्क का जाल': ACB रेड के 6 महीने बाद भी हालात बदतर, साहब 'मीटिंग' में व्यस्त और जनता चक्कर काटने को मजबूर

        CGVARTACGVARTA
        Nov 2, 2026, 6:11 PM
        रायपुर आरटीओ में फैला 'नेटवर्क का जाल': ACB रेड के 6 महीने बाद भी हालात बदतर, साहब 'मीटिंग' में व्यस्त और जनता चक्कर काटने को मजबूर
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        क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय रायपुर में आम जनता की परेशानियां कम होने का नाम नहीं ले रही हैं।

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        रायपुर (CGVARTA)। क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय रायपुर में आम जनता की परेशानियां कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। शोभा राम साहू पर हुई एसीबी (ACB) की रेड के बाद ऐसा लगा था कि कार्यालय की व्यवस्थाओं में कुछ सुधार आएगा और कामकाज में पारदर्शिता दिखेगी, लेकिन 6 महीने बीत जाने के बाद भी स्थितियां सुधरने की बजाय और ज्यादा लचर हो चुकी हैं।

        एक ही लिपिक के भरोसे आधा RTO

        एसीबी की कार्रवाई के बाद से कार्य विभाजन के नाम पर जो व्यवस्था बनाई गई, उसने पूरे आरटीओ की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है। परमिट, मोटरसाइकिल, कार, बस से संबंधित समस्त महत्वपूर्ण कार्य और अन्य विभिन्न शाखाओं का प्रभार लिपिक प्रकाश बिछिया को सौंप दिया गया है। पिछले 6 महीनों से अकेला एक लिपिक इतने बड़े विभाग का बोझ संभाल रहा है, जिसके चलते फाइलों का अंबार लगा हुआ है और जनता अपने छोटे-छोटे कामों के लिए रोजाना दफ्तर के चक्कर काटने को विवश है।

        साहब हमेशा 'मीटिंग' में, दफ्तर से नदारद रहते हैं RTO आशीष देवांगन

        वर्तमान में आरटीओ रायपुर में काम की गति पूरी तरह ठप पड़ चुकी है। क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी (RTO) आशीष देवांगन अधिकांश समय अपने कार्यालय से अनुपस्थित रहते हैं। हमारी टीम पिछले 6 महीनों से लगातार क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी आशीष देवांगन से मिलकर इस पूरे गंभीर मामले पर उनका पक्ष जानने और जनता की समस्याओं को उनके सामने रखने का प्रयास कर रही है। लेकिन हर बार नतीजा शून्य ही रहता है।

        साहब या तो अपने चेम्बर से नदारद मिलते हैं, और यदि कभी गलती से दफ्तर में मौजूद भी हों, तो आम जनता या मीडिया से मुलाकात नहीं होती। हर बार कर्मचारियों द्वारा एक ही रटा-रटाया जवाब थमा दिया जाता है— "साहब मीटिंग में हैं।"

        सवाल : इन अंतहीन 'मीटिंगों' से हासिल क्या हो रहा है?

        अब सबसे बड़ा और अहम सवाल यह उठता है कि आखिर साहब दिन-रात इतनी बड़ी-बड़ी मीटिंगें करके क्या हासिल करना चाहते हैं? जब इन बैठकों का कोई सकारात्मक असर कार्यालय की कार्यप्रणाली पर दिख ही नहीं रहा, तो फिर यह कसरत किसके लिए?

        एक तरफ अधिकारी बैठकों के नाम पर कमरों में बंद हैं या गायब हैं, वहीं दूसरी तरफ चिलचिलाती धूप और गर्मी में दूर-दराज़ से आए नागरिक अपने लाइसेंस, परमिट और गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन के लिए एक काउंटर से दूसरे काउंटर तक सिर्फ धक्के खा रहे हैं।

        एसीबी की कार्रवाई के बाद पटरी से उतरी व्यवस्था को सुधारने की जगह जिम्मेदार अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़कर बैठे हैं। अगर आरटीओ की यही कार्यशैली रही, तो जनता का शासन और प्रशासन पर से भरोसा उठना तय है। अब देखना यह होगा कि परिवहन विभाग के उच्च अधिकारी इस सुस्त और लापरवाही भरी व्यवस्था पर कब संज्ञान लेते हैं या फिर जनता यूं ही 'साहब की मीटिंग' खत्म होने का इंतजार करती रहेगी।

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